निर्भया कांड के बाद, महिलाओं के खिलाफ हुए अपराध की अधिक रिपोर्ट, लेकिन न्याय की गति धीमी

मुंबई: 2012 में दिल्ली में हुए गैंगरेप, जिसे निर्भया कांड  कहा जाता है, के बाद महिलाओं के साथ दुर्व्यवहार और यौन हमलों पर रिपोर्ट करने की संभावना ज्यादा है, लेकिन गिरफ्तारी और सजा दरों पर बहुत कम या कोई प्रभाव नहीं पड़ा है। यह जानकारी फरवरी 2019 में प्रकाशित एक अध्ययन में सामने आई है।

अध्ययन से पता चलता है कि दो साल से 2015 तक, दिल्ली में बलात्कार के मामलों की वार्षिक औसत रिपोर्ट, 2011 के दशक के वार्षिक औसत की तुलना में 23 फीसदी ज्यादा थी। निर्भया कांड से पहले की वार्षिक औसत तुलना में 2013-2015 के दौरान छेड़छाड़ और यौन उत्पीड़न की औसत वार्षिक रिपोर्टिंग 40 फीसदी अधिक थी।

16 दिसंबर 2012 को, एक 23 वर्षीय छात्रा के साथ दक्षिण दिल्ली में गुजर रही बस में छह लोगों ने मारपीट की और उसके साथ सामूहिक बलात्कार किया। क्रूर हमले के बाद, उसे सड़क के किनारे फेंक दिया गया था, और 13 दिनों के बाद, गंभीर जख्म के कारण दम तोड़ दिया। अपराध के खिलाफ पूरे देश में व्यापक सार्वजनिक विरोध प्रदर्शन हुए और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर लोगों का ध्यान इस कांड पर आया। जैसा कि भारतीय कानून ने पीड़िता की पहचान को प्रकट करने से मना किया है, उसे निर्भया कहा जाता है।

लेखक, अक्षय भटनागर, अपर्णा माथुर, अब्दुल मुनसीब, और देवेश रॉय ने 9 अप्रैल, 2019 को इंडिया ‘आइडियाज फॉर इंडिया’ के लिए लिखा है, "निर्भया कांड और उसके बाद की घटनाएं संघर्ष का कारण बनती हैं। अभूतपूर्व मीडिया कवरेज से पीड़ित के प्रति जो व्यापक सहानुभूति उत्पन्न हुई, और इस भीषण अपराध के बाद जनता में आक्रोश का स्तर और तीव्रता देखी गई, इन सबने पीड़ितों को आगे आने और न्याय की मांग करने के लिए प्रोत्साहित किया, ऐसा कहा जा सकता है।"

लेखकों का मामला है कि यह मामला और इसका प्रभाव, यौन उत्पीड़न के खिलाफ चल रहे #MeToo आंदोलन की तरह है, जो अक्टूबर 2017 में विश्व स्तर पर चला था, जब कई महिलाओं ने यौन शोषण के खिलाफ बात की थी। अमेरिकन एंटरप्राइज इंस्टीट्यूट की शोधकर्ता अपर्णा माथुर ने इंडियास्पेंड को बताया, "हमारा विचार है कि निर्भया कांड भारत में #MeToo आंदोलन की चिंगारी है। मुझे लगता है कि भारत एक बदलाव के दौर से गुजर रहा है जहां महिलाओं को और ज्यादा बोलने के लिए और प्रोत्साहित किया जा रहा है, उनके खिलाफ अपराधों की रिपोर्ट करने की अधिक संभावना है, और न्याय की मांग करने की अधिक संभावना है, जैसा कि हमारा दस्तावेज भी कहता है।" 

महिलाओं के खिलाफ अपराधों में गिरफ्तारी पर निर्भया कांड का प्रभाव नहीं

शोधकर्ताओं के अनुसार, जबकि निर्भया कांड में नाराजगी ने कानूनी और प्रशासनिक नीति में बदलाव को भी प्रेरित किया, इससे दिल्ली में बलात्कार, छेड़छाड़ और यौन उत्पीड़न के लिए गिरफ्तारी और सजा पर थोड़ा या ना के बराबर प्रभाव पड़ा है। उन्होंने लिखा, "महिलाओं के खिलाफ अपराधों के लिए सजा दरों में बहुत कम बदलाव हुए हैं, जो सुझाव देते हैं कि पुलिसिंग और अन्य बदलावों ने रिपोर्टिंग से परे परिणामों को प्रभावित नहीं किया।" 

अध्ययन में पाया गया है कि, वास्तव में, बलात्कार अपराधों के लिए सजा की दर 2007 के बाद से लगातार गिरावट पर है और 2006 में 27 फीसदी से 2016 में 18.9 फीसदी के ऐतिहासिक निम्न स्तर पर पहुंच गया है।

माथुर कहते हैं, '' लेकिन यह याद रखना महत्वपूर्ण है कि गुनाह साबित होने में लंबा समय लग सकता है।” उन्होंने आगे बताया कि बढ़ती हुई रिपोर्टिंग बदलाव कर सकता है। लेकिन 2 फीसदी से कम घरेलू हिंसा के मामले पुलिस को रिपोर्ट किए जाते हैं। हालांकि उम्मीद है कि भारत में इस तरह के #मीटू आंदोलन के साथ, उन रिपोर्टिंग दरों में वृद्धि शुरू हो सकती है, जिससे आगे और अधिक गिरफ्तारियां और दोष सिद्ध हो सकते हैं।"

अध्ययन की प्रक्रिया क्या थी?

राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) के आंकड़ों का उपयोग करते हुए, शोधकर्ताओं ने दिल्ली में महिलाओं के खिलाफ अपराधों की रिपोर्टिंग पर  2012 के निर्भया मामले के असर को समझने के लिए "सिंथेटिक नियंत्रण विधि प्रयोग" किया। 

इसमें, दिल्ली, जहां निर्भया कांड हुआ, को एक 'ट्रीटेड' यूनिट माना जाता है। एक आदर्श प्रति-तथ्यात्मक "नियंत्रण" इकाई के लिए,अन्य सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के भारित औसत आंकड़ों की मदद से एक सिंथेटिक दिल्ली का निर्माण किया गया था। सिंथेटिक दिल्ली के इस नमूने में विभिन्न आर्थिक, जनसांख्यिकीय, राजनीतिक और कानून और व्यवस्था की विशेषताएं शामिल थीं, जो राजधानी शहर में होती हैं।

अपने निष्कर्षों की मजबूती की जांच करने के लिए ( इस संभावना के लिए समायोजित करना कि बढ़ी हुई रिपोर्टिंग केवल अपराध में सामान्य वृद्धि के कारण नहीं है ) शोधकर्ताओं ने हत्या और गैर-इरादतन हत्या पर निर्भया मामले के प्रभाव का परीक्षण किया, और कोई प्रभाव नहीं देखा।

उन्होंने एक फॉल्सफकेशन टेस्ट भी किया - जहां एक परिकल्पना, एक परीक्षण से अलग, और संबंधित होने की संभावना नहीं है - एक सेफगार्ड के रूप में टेस्ट किया जाता है। इसके लिए, उन्होंने सड़क दुर्घटनाओं की रिपोर्टिंग पर निर्भया मामले के अनुचित प्रभाव की जांच की, और कोई प्रभाव नहीं पाया, इस प्रकार उनके निष्कर्षों की पुष्टि हुई।

रिपोर्टिंग में परेशानियां

अध्ययन में कहा गया है कि भारत में महिलाओं के खिलाफ अपराधों की रिपोर्टिंग को दबाने के लिए सामाजिक और संस्थागत तत्व काफी मजबूत हैं।

शोधकर्ताओं ने कहा, "कानून प्रवर्तन अधिकारियों की उदासीनता, समाज में बदनाम होने का डर और प्रतिशोध का डर जैसे कारक हैं, जिससे महिलाओं के खिलाफ अपराधों की पर्याप्त रिपोर्टिंग नहीं होती है।”

पीड़ितों को मिली-जुली भावना का सामना करना पड़ता है। उसे कलंकित किया जाता है। लांछन लगाए जाते हैं। कई तरह के समाज में बलात्कार पीड़ित को गंदा और अपवित्र माना जाता है, जैसा कि लेखकों ने पिछले कई अध्ययनों का उल्लेख करते करते हुए लिखा है। शोधकर्ताओं ने कहा कि महिलाओं के खिलाफ अपराधों की रिपोर्टिंग में वृद्धि एक महत्वपूर्ण बदलाव है, क्योंकि रिपोर्टिंग की कमी महिलाओं के खिलाफ अपराधों को संबोधित करने में सबसे मौलिक और आम बाधा है।

माथुर कहते हैं, "यह एक अद्भुत बदलाव और एक अद्भुत अवसर है। हमें उम्मीद है कि यह कानून और व्यवस्था, पुलिस, अदालत प्रणाली, आदि में बड़े संस्थागत बदलावों को बढ़ावा देगा, ताकि न केवल एक अपराध की रिपोर्ट करना आसान हो जाए, बल्कि अपराधियों के खिलाफ मुकदमा चलाना भी आसान हो जाए।"

(सलदानहा एसोसिएट एडिटर हैं और इंडियास्पेंड के साथ जुड़ी हैं।)

यह लेख मूलत: अंग्रेजी में 03 अगस्त को 2019 IndiaSpend.com पर प्रकाशित हुआ है।

हम फीडबैक का स्वागत करते हैं। कृपया respond@indiaspend.org पर लिखें। हम भाषा और व्याकरण के लिए प्रतिक्रियाओं को संपादित करने का अधिकार सुरक्षित रखते हैं।

मुंबई: 2012 में दिल्ली में हुए गैंगरेप, जिसे निर्भया कांड  कहा जाता है, के बाद महिलाओं के साथ दुर्व्यवहार और यौन हमलों पर रिपोर्ट करने की संभावना ज्यादा है, लेकिन गिरफ्तारी और सजा दरों पर बहुत कम या कोई प्रभाव नहीं पड़ा है। यह जानकारी फरवरी 2019 में प्रकाशित एक अध्ययन में सामने आई है।

अध्ययन से पता चलता है कि दो साल से 2015 तक, दिल्ली में बलात्कार के मामलों की वार्षिक औसत रिपोर्ट, 2011 के दशक के वार्षिक औसत की तुलना में 23 फीसदी ज्यादा थी। निर्भया कांड से पहले की वार्षिक औसत तुलना में 2013-2015 के दौरान छेड़छाड़ और यौन उत्पीड़न की औसत वार्षिक रिपोर्टिंग 40 फीसदी अधिक थी।

16 दिसंबर 2012 को, एक 23 वर्षीय छात्रा के साथ दक्षिण दिल्ली में गुजर रही बस में छह लोगों ने मारपीट की और उसके साथ सामूहिक बलात्कार किया। क्रूर हमले के बाद, उसे सड़क के किनारे फेंक दिया गया था, और 13 दिनों के बाद, गंभीर जख्म के कारण दम तोड़ दिया। अपराध के खिलाफ पूरे देश में व्यापक सार्वजनिक विरोध प्रदर्शन हुए और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर लोगों का ध्यान इस कांड पर आया। जैसा कि भारतीय कानून ने पीड़िता की पहचान को प्रकट करने से मना किया है, उसे निर्भया कहा जाता है।

लेखक, अक्षय भटनागर, अपर्णा माथुर, अब्दुल मुनसीब, और देवेश रॉय ने 9 अप्रैल, 2019 को इंडिया ‘आइडियाज फॉर इंडिया’ के लिए लिखा है, "निर्भया कांड और उसके बाद की घटनाएं संघर्ष का कारण बनती हैं। अभूतपूर्व मीडिया कवरेज से पीड़ित के प्रति जो व्यापक सहानुभूति उत्पन्न हुई, और इस भीषण अपराध के बाद जनता में आक्रोश का स्तर और तीव्रता देखी गई, इन सबने पीड़ितों को आगे आने और न्याय की मांग करने के लिए प्रोत्साहित किया, ऐसा कहा जा सकता है।"

लेखकों का मामला है कि यह मामला और इसका प्रभाव, यौन उत्पीड़न के खिलाफ चल रहे #MeToo आंदोलन की तरह है, जो अक्टूबर 2017 में विश्व स्तर पर चला था, जब कई महिलाओं ने यौन शोषण के खिलाफ बात की थी। अमेरिकन एंटरप्राइज इंस्टीट्यूट की शोधकर्ता अपर्णा माथुर ने इंडियास्पेंड को बताया, "हमारा विचार है कि निर्भया कांड भारत में #MeToo आंदोलन की चिंगारी है। मुझे लगता है कि भारत एक बदलाव के दौर से गुजर रहा है जहां महिलाओं को और ज्यादा बोलने के लिए और प्रोत्साहित किया जा रहा है, उनके खिलाफ अपराधों की रिपोर्ट करने की अधिक संभावना है, और न्याय की मांग करने की अधिक संभावना है, जैसा कि हमारा दस्तावेज भी कहता है।" 

महिलाओं के खिलाफ अपराधों में गिरफ्तारी पर निर्भया कांड का प्रभाव नहीं

शोधकर्ताओं के अनुसार, जबकि निर्भया कांड में नाराजगी ने कानूनी और प्रशासनिक नीति में बदलाव को भी प्रेरित किया, इससे दिल्ली में बलात्कार, छेड़छाड़ और यौन उत्पीड़न के लिए गिरफ्तारी और सजा पर थोड़ा या ना के बराबर प्रभाव पड़ा है। उन्होंने लिखा, "महिलाओं के खिलाफ अपराधों के लिए सजा दरों में बहुत कम बदलाव हुए हैं, जो सुझाव देते हैं कि पुलिसिंग और अन्य बदलावों ने रिपोर्टिंग से परे परिणामों को प्रभावित नहीं किया।" 

अध्ययन में पाया गया है कि, वास्तव में, बलात्कार अपराधों के लिए सजा की दर 2007 के बाद से लगातार गिरावट पर है और 2006 में 27 फीसदी से 2016 में 18.9 फीसदी के ऐतिहासिक निम्न स्तर पर पहुंच गया है।

माथुर कहते हैं, '' लेकिन यह याद रखना महत्वपूर्ण है कि गुनाह साबित होने में लंबा समय लग सकता है।” उन्होंने आगे बताया कि बढ़ती हुई रिपोर्टिंग बदलाव कर सकता है। लेकिन 2 फीसदी से कम घरेलू हिंसा के मामले पुलिस को रिपोर्ट किए जाते हैं। हालांकि उम्मीद है कि भारत में इस तरह के #मीटू आंदोलन के साथ, उन रिपोर्टिंग दरों में वृद्धि शुरू हो सकती है, जिससे आगे और अधिक गिरफ्तारियां और दोष सिद्ध हो सकते हैं।"

अध्ययन की प्रक्रिया क्या थी?

राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) के आंकड़ों का उपयोग करते हुए, शोधकर्ताओं ने दिल्ली में महिलाओं के खिलाफ अपराधों की रिपोर्टिंग पर  2012 के निर्भया मामले के असर को समझने के लिए "सिंथेटिक नियंत्रण विधि प्रयोग" किया। 

इसमें, दिल्ली, जहां निर्भया कांड हुआ, को एक 'ट्रीटेड' यूनिट माना जाता है। एक आदर्श प्रति-तथ्यात्मक "नियंत्रण" इकाई के लिए,अन्य सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के भारित औसत आंकड़ों की मदद से एक सिंथेटिक दिल्ली का निर्माण किया गया था। सिंथेटिक दिल्ली के इस नमूने में विभिन्न आर्थिक, जनसांख्यिकीय, राजनीतिक और कानून और व्यवस्था की विशेषताएं शामिल थीं, जो राजधानी शहर में होती हैं।

अपने निष्कर्षों की मजबूती की जांच करने के लिए ( इस संभावना के लिए समायोजित करना कि बढ़ी हुई रिपोर्टिंग केवल अपराध में सामान्य वृद्धि के कारण नहीं है ) शोधकर्ताओं ने हत्या और गैर-इरादतन हत्या पर निर्भया मामले के प्रभाव का परीक्षण किया, और कोई प्रभाव नहीं देखा।

उन्होंने एक फॉल्सफकेशन टेस्ट भी किया - जहां एक परिकल्पना, एक परीक्षण से अलग, और संबंधित होने की संभावना नहीं है - एक सेफगार्ड के रूप में टेस्ट किया जाता है। इसके लिए, उन्होंने सड़क दुर्घटनाओं की रिपोर्टिंग पर निर्भया मामले के अनुचित प्रभाव की जांच की, और कोई प्रभाव नहीं पाया, इस प्रकार उनके निष्कर्षों की पुष्टि हुई।

रिपोर्टिंग में परेशानियां

अध्ययन में कहा गया है कि भारत में महिलाओं के खिलाफ अपराधों की रिपोर्टिंग को दबाने के लिए सामाजिक और संस्थागत तत्व काफी मजबूत हैं।

शोधकर्ताओं ने कहा, "कानून प्रवर्तन अधिकारियों की उदासीनता, समाज में बदनाम होने का डर और प्रतिशोध का डर जैसे कारक हैं, जिससे महिलाओं के खिलाफ अपराधों की पर्याप्त रिपोर्टिंग नहीं होती है।”

पीड़ितों को मिली-जुली भावना का सामना करना पड़ता है। उसे कलंकित किया जाता है। लांछन लगाए जाते हैं। कई तरह के समाज में बलात्कार पीड़ित को गंदा और अपवित्र माना जाता है, जैसा कि लेखकों ने पिछले कई अध्ययनों का उल्लेख करते करते हुए लिखा है। शोधकर्ताओं ने कहा कि महिलाओं के खिलाफ अपराधों की रिपोर्टिंग में वृद्धि एक महत्वपूर्ण बदलाव है, क्योंकि रिपोर्टिंग की कमी महिलाओं के खिलाफ अपराधों को संबोधित करने में सबसे मौलिक और आम बाधा है।

माथुर कहते हैं, "यह एक अद्भुत बदलाव और एक अद्भुत अवसर है। हमें उम्मीद है कि यह कानून और व्यवस्था, पुलिस, अदालत प्रणाली, आदि में बड़े संस्थागत बदलावों को बढ़ावा देगा, ताकि न केवल एक अपराध की रिपोर्ट करना आसान हो जाए, बल्कि अपराधियों के खिलाफ मुकदमा चलाना भी आसान हो जाए।"

(सलदानहा एसोसिएट एडिटर हैं और इंडियास्पेंड के साथ जुड़ी हैं।)

यह लेख मूलत: अंग्रेजी में 03 अगस्त को 2019 IndiaSpend.com पर प्रकाशित हुआ है।

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